फ़रवरी 16,
रांची, कभी संस्कृति
शिक्षा केन्द्र के रूप में पूरे संयुक्त बिहार में
विख्यात रांची के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय की स्थिति
वर्तमान संभव में दयनीय हो चुकी है। झारखंड का यह एक
मात्र संस्कृत महाविद्यालय है। श महाविद्यालय की स्थापना
1920 में हुई थी। आजादी के बाद यह संयुक्त बिहार सरकार
के अधीन था। जब तब पटना, मुजफ्फरपुर, रांची एवं भागलपुर
में ही संस्कृत महाविद्यालय थे। झारखंड अलग राज्य गठन के
बाद राजकीय संस्कृत महाविद्यालय को विनोवा भावे
विश्वविद्यालय से सम्बध्द कर दिया गया। कभी इस
महाविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र नामांकन कराते थे।
महाविद्यालय में योग्य शिक्षकों की भी कमी नहीं थी। पठन
पाठन का माहौल बहुत अच्छा था । छात्रावास में रहने वाले
छात्रों की भोजन की व्यवस्था महाविद्यालय द्वारा की जाती
थी। लेकिन समय गुजरने के साथ संस्कृत के प्रति छात्रों
का उत्साह एवं लगाव कम होता गया। शिक्षक भी सेवानिवृत
होते गये। सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन भी उदासीन होते
चल गये। नतीजतन कालेज की स्थिति धीर-धीरे खराब होती चली
गयी। मरम्मत और रख रखाव के अभाव में महाविद्यालय का भवन
जर्जर होता चला गया। अब हालत यह है कि यहां छात्रों के
बैठने के लिए कुर्सी एवं टेबल की भी व्यवस्था नहीं है।
वर्तमान में महाविद्यालय में सौ से ऊपर छात्र हैं। पर
उनके लिए यहां किसी चीज की व्यवस्था नहीं है।
महाविद्यालय भवन में मात्र चार कमरे बचे हैं जिनमें से
दो कमरे गिर चुके हैं, शेष दो कमरों में एक कार्यलाय एवं
एक प्रधाध्यापक कक्ष हैं। छात्रों को विद्यालय के मैदान
में बैठकर पढ़ना पड़ता है। यहां छात्रों के लिए पेय जल की
भी व्यवस्था भी नहीं है न ही शौचालय की ही व्यवस्था है।
पहले कालेज परिसर में दो कुएं थे और कई शौचालय। लेकिन अब
कुएं धंस चुके हैं और शौचालय गिर गये हैं। लेकिन अब यहां
ज्यादातर छात्र रांची से बाहर के हैं। लेकिन महाविद्यालय
का छात्रावास इस स्थिति में नहीं है कि उसमें रहा जा सके।
छात्रावास में दो कमरे हैं जो कभी भी गिर सकते हैं। दो
कमरों में 14 से 15 छात्र रहते हैं। महाविद्यालय के
छात्र विकास पाण्डेय ने कहा कि हम यहां बड़ी उम्मीद के
साथ अध्ययन के लिए आये थे लेकिन यहां पढ़ाई के लिए
वातावरण ही नहीं है। भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है।
शिक्षकों की भारी कमी है। हमें मैदान में पढ़ना पड़ता है।
बरसात के दिनों में हमें ज्यादा परेशानी होती है। पूरे
बरसात में पढ़ाई बंद हो जाती है। हमें छात्रावास में जो
कमरे मिले हैं, उनकी स्थिति बहुत खराब है। हम ल ग बाहर
से यहां पढ़ने आये हैं। लेकिन महाविद्यालय की स्थिति सही
नहीं होने के कारण यहां छात्रों की संख्या में कमी आ रही
है? शास्त्री तृतीय खंड के छात्र कृष्ण चन्द्र शर्मा ने
कहा कि महाविद्यालय में प्राध्यापक तो हैं पर यहां
अध्ययन की उपयुक्त जगह महाविद्यालय में मूलभूत सुविधाओं
के अभाव में बड़ी संख्या में छात्र कालेज नहीं आते। कुछ
छात्र यहां सिर्फ फार्म भरने आते हैं एवं परीक्षा देते
हैं। ताकि उन्हें डिग्री मिल सके और वे-रोजी-रोजगार से
जुड़ सके। प्राधानाध्यापक ब्रहम देव मिश्रा ने कहा कि यह
महाविद्यालय बिनोवा भावे विश्वविद्यालय का अंगीभूत है।
विश्वविद्यालय के महाविद्यालय के जर्जर भवन, शैक्षणिक
महौल और मूलभूत सुविधाओं के घोर अभाव से कई बार अवगत
कराया गया, पर महाविद्यालय की स्थिति में सुधार के लिए
कोई कदम नहीं उठाया गया। महाविद्यालय की खराब हालत के
कारण छात्र भी कम संख्या में नामांकन करा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि संस्कृत एक ऐसी भाषा है जिससे हमें न
केवल आयुर्वेदिक ज्योतिष, वेद-वेदान्त, ज्ञान-विज्ञान
समेत दुर्लभ प्राचीन भारतीय विद्याओं का ज्ञान प्रात होता
बल्कि यह हमें अतीत की संस्कृति से भी जोड़ती है। उन्होंने
कहा कि इस महाविद्यालय में मात्र चार शिक्षक हैं। नयी
नियुक्तियां नहीं हो रही है। बिहार के तीनों महाविद्यालयों
की स्थिति बहुत अच्छी है। लेकिन यहां की स्थिति दिन पर
दिन खराब होती जा रही है। मगर ऐसा ही चलता रहा तो आने
वाले कुछ वर्षों ममें संस्कृति झारखंड से लुप्त हो जाएगी।
र्ा ब्ह्म देव मिश्रा ने कहा कि बिनोवा भावे
विश्वविद्यालय एवं झारखंड सरकार अविलम्ब इस महाविद्यालय
पर ध्यान दें। यहां आचार्य (एम.ए) एवं शास्त्री (बीएड)
की पढ़ाई शुरू की जाए। भवन मरम्मत का कार्य शुरू करना
जरूरी है क्योंकि संस्कृति महाविद्यालय के साथ जमीन की
कमी नहीं है। अगर इस महाविद्यालय पर ध्यान दिया गया तो
आने वाले यह इसकी पुरानी गरिमा लौट सकती है। यह कालेज
फिर से छात्रों से गुलजार हो सकता है।




